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गुरुवार, 23 सितंबर 2021

पितृ पक्ष में कई दंपत्ति निकले चार धाम यात्रा पर।



करनैलगंज गोंडा। पितरों के शांति व मुक्ति के लिए पित्रपक्ष के शुरुआत में चार धाम यात्रा पर निकले दर्जनों यात्री,वहीं ग्राम पंचायत पहाड़ापुर से वरिष्ठ पत्रकार व एक संभ्रांत व्यक्ति श्रीनाथ रस्तोगी की अगुवाई में कई दंपत्ति निकले चार धाम यात्रा पर।आपको बताते चले की पितृ पक्ष में पितरों को जल दान पिंडदान तथा श्राद्ध की विशेषता गृहस्थ के तीन प्रकार के कर्म होते हैं नित्य कर्म नैमित्तिक कर्म तथा नित्य नैमित्त कर्म है। इसके आकार भी हैं पंच यज्ञ संबंधी कर्म नित्य कर्म कहलाता है पुत्र जन्म के उपलक्ष में किए हुए कर्म को नैमित्तिक कर्म कहते हैं पर्व के अवसर पर जो श्राद्ध किए जाते हैं उन्हें नित्य नैमित्तिक कर्म कहा जाता है जिससे पुत्र जन्म के अवसर पर ज्यादा कर्म संस्कार के साथ किया जाता है विवाह आदि में भी भली-भांति उसका अनुष्ठान करना चाहिए नांदिमुख नाम के जो पित्र हैं उन्हीं को इसमें पूजन करना चाहिए और उन्हें दधी मिश्रित जो के पिंड देने चाहिए पंडित गणेश दत्त दिवेदी जी कहते हैं कि मृत व्यक्ति की जिस दिन तिथि मैं उसका मृत्यु हो उस तिथि को एकोठिस्ट श्राद्ध करना चाहिए उसने विशवै देवों का पूजन नहीं होता है एक ही पाविभिक का उपयोग किया जाता है इसमें धूप दीप आदि की क्रिया नहीं होती जल के साथ अपशव्य होकर (जनेऊ को दाहिने कंधे पर डाल कर) उसका नाम गोत्र स्मरण कर एक पिंड देना चाहिए।इसके बाद हाथ में जल लेकर अमुक के श्राद्ध में दिया हुआ अन पान आदि अच्छे हो यह कहकर वह जल पिंड पर छोड़ दें फिर ब्राह्मणों का विसर्जन करते समय आप लोग प्रसन्न हो इस प्रकार कहना चाहिए ब्राह्मण लोग कहें (अभिरत: स्म) हम संतुष्ट हैं। 

इस प्रकार कहें इसे इकोदिंद्घ श्राद्ध कहते हैं इसमें अपशव्य होकर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए इसकी कुछ विशेष प्रक्रिया है इसमें तिल चंदन और जोर से युक्त चार पात्र होते हैं इसमें तीन पितरों के लिए और एक प्रेत के लिए होता है। प्रेत का पात्र और आर्द्घ को लेकर (यह सभान: सयनस: पितरों यमराज) इत्यादि मंत्र का जाप करते हुए पितरों के तीनों पात्रों को सूचना चाहिए यदि पुत्र ना हो तो स्त्रियों का सपिंडीकरण नहीं पुत्र के अभाव में सपिंडी के अभाव में सहूदक उनके भी अभाव में माता सपिंडी और सहोदर इस विधि को पूरा करें जिस के कोई पुत्र नहीं है उसका श्राद्ध उसके दौहालिम कर सकते हैं पुत्री के पुत्र नाना का नैमित्तिक श्राद्ध कर सकते हैं पंडित गणेश दत्त दिवेदी जी बताते हैं मनुष्य पृथ्वी पर जो अन्न बिखरते हैं उनसे पिशाच योनि में पड़े हुए पितरों की तृप्ति होती है स्नान के सक्षम से जो जल पृथ्वी पर टपकता है उससे वृक्ष की योनि में पड़े पितरों की तृप्ति होती है नहाने के समय जो जल केकड़ पृथ्वी पर गिरते हैं।उससे पशु पक्षी की योन में पड़े पितरों की तृप्ति होती है कुल में जो श्राद्ध योग्य होकर भी संस्कार से वंचित रह गए हैं अथवा जलकर मरे हैं वह बिखरे हुए अंत और सामार्जन के जल को ब्राह्मण नहीं करते ब्राह्मण लोग जब भोजन करके हाथ मूल होते हैं और चरणों का प्रक्षालन करते हैं उस जल से अन्यान पितरों की तृप्ति होती है उत्तम विधि से श्राद्ध करने से पुरुषों में अन्य पितृ जो दूसरे योनि में चले गए हैं तो भी श्राद्ध से उन्हें बड़ी तृप्ति मिलती है इस प्रकार मनुष्य को उचित है कि वह पितरों में प्रति भक्ति भाव रखकर विधिपूर्वक श्राद्ध करें श्राद्ध करने वाले पुरुष के कुल में कोई दुख नहीं भोक्ता और सब सुखी रहते हैं पूरे जीवन काल में आनंद पूर्वक धन-धान्य से परिपूर्ण रहते हैं।

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